वेदों का महत्त्व

     

     जैसे दही में मक्खन, मनुष्यों में ब्राह्मण, ओषधियों में अमृत, नदियों में गंगा और पशुओं में गौ श्रेष्ठ है ठीक इसी प्रकार समस्त साहित्य में वेद सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

 वेद शब्द ‘विद्’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से बनता है, और ‘विद्’ धातु के अनेक अर्थ हैं जैसे ज्ञान, सत्ता, विचार, लाभ और चेतना; इस प्रकार वेद वह ग्रंथ है जिसके पठन, मनन और निदिध्यासन से मनुष्य को यथार्थ विद्या का विज्ञान प्राप्त होता है, जिससे वह कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म का विवेक कर पाता है, सभी सुखों का लाभ प्राप्त करता है और जिसमें समस्त विद्याएँ बीज रूप में विद्यमान रहती हैं वे पुस्तक वेद कहाती हैं।

वेदों की नित्यता और सर्वोच्चता
                वेद प्रभु-प्रदत्त ईश्वरीय ज्ञान है। यह ज्ञान सृष्टि के आरम्भ में मानव मात्र के कल्याण के लिये दिया गया वेद वैदिक संस्कृति के मूलाधार, शिक्षाओं के आगार और ज्ञान के भण्डार हैं। वेद संसार रूपी सागर से पार उतरने के लिए नौका रूप हैं। वेद में मनुष्य जीवन की सभी प्रमुख समस्याओं का समाधान वे सांसारिक तापों से सन्तप्त लोगों के लिए शीतल प्रलेप हैं, अज्ञानान्धकार में पड़े हुए मनुष्यों के लिये वे प्रकाश स्तम्भ हैं, भूले भटके लोगों को वे सन्मार्ग दिखाते हैं, निराशा के सागर में डूबने वालों के लिये वे आशा की किरण हैं, शोक से पीड़ित लोगों को वे आनन्द एवं उल्लास का संदेश प्रदान करते हैं, पथभ्रष्टों को कर्तव्य का ज्ञान प्रदान करते हैं, अध्यात्मपथ के पथिकों को प्रभुप्राप्ति के साधनों का उपदेश देते हैं। संक्षेप में वेद अमूल्य रत्नों के भण्डार हैं। महर्षि दयानन्द के शब्दों में “वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है।”

 महर्षि मनु के शब्दों में वेद ज्ञान प्रकाशवेदोऽखिलो धर्ममूलम् ० (मनु० २।६)

👉 वेद धर्म की मूल पुस्तक है।

                        वेद—एक दर्पण की तरह—वैदिक विज्ञान, राष्ट्रीय कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक जीवन, वर्ण-आश्रम व्यवस्था, सत्य, प्रेम, अहिंसा और त्याग की भावना को दर्शाते हैं। वेद मानवता की अमूल्य निधि हैं।

महर्षि अत्रि के अनुसारनास्ति वेदात् परं शास्त्रम् । ( अत्रि स्मृति १५१)

           👉 वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है ।

 इसीलिये महर्षि मनु ने कहा है‘सर्वज्ञानमयो हि सः।’ (मनु २।७)

            👉 वेद सब विद्याओं के भण्डार हैं।


योगदर्शन कार महर्षि पतञ्जलि का कथन है

एव पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ।     ( यो० १।२६ )

            👉 वह ईश्वर नित्य वेद-ज्ञान को देने के कारण सब पूर्वजों का भी गुरु है। अन्य गुरु काल के मुख में चले जाते हैं परन्तु वह काल के बन्धन से रहित है।
वेदान्तदर्शन में वेद का गौरव निम्न शब्दों में प्रकट किया गया है

शास्त्रयोनित्वात् । ( वेदान्त०१।१।३ )

               👉 ईश्वर शास्त्र = वेद का कारण है। वेद ज्ञान ईश्वर प्रदत्त है। इस सूत्र पर शंकराचार्य का भाष्य पठनीय है। हम यहां उसका हिन्दी रूपा-न्तर दे रहे हैं –

               “ऋग्वेदादि जो चार वेद हैं वे अनेक विद्याओं से युक्त हैं। सूर्यादि के समान सब सत्यार्थों के प्रकाश करने वाले हैं। उनको बनाने वाला सर्वज्ञ-त्वादि गुणों से युक्त सर्वज्ञ-ब्रह्म ही है वयोंकि ब्रह्म से भिन्न कोई जीव सर्वगुण युक्त इन वेदों की रचना कर सके ऐसा सम्भव नहीं है।”
इस प्रकार समस्त शास्त्र एक स्वर से वेद के गौरव, नित्यता और स्वतःप्रमाणता का वर्णन करते हैं। 6 of

             ब्राह्मण ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर वेद के महत्त्व का प्रदर्शन करने वाले स्थल उपलब्ध होते है। यहां हम केवल तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।१०।११।३ की एक आख्यायिका देना पर्याप्त समझते हैं।

               “महर्षि भरद्वाज ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए ३०० वर्ष पर्यन्त वेदों का गहन एवं गम्भीर अध्ययन किया। इस प्रकार निष्ठापूर्वक वेदों का अध्ययन करते करते जब भारद्वाज अत्यन्त वृद्ध हो गये तो इन्द्र ने उनके पास आकर कहा- “यदि आपको सौ वर्ष की आयु और मिले तो आप क्या करेंगे ?” भरद्वाज ने उत्तर दिया- मैं उस आयु को भी ब्रह्मचर्य पालन करते हुए वेदा-घ्ययन में ही व्यतीत करूंगा। तब इन्द्र ने पर्वत के समान तीन ज्ञान-राशिरूप वेदों को दिखाया और प्रत्येक राशि से मुट्ठी भर कर भरद्वाज से कहा- ‘ये वेद इस प्रकार ज्ञान की राशि या पर्वत के समान हैं। इनके ज्ञान का कहीं अन्त नहीं है। ‘अनन्ता वै वेदाः’ वेद तो अनन्त हैं। यद्यपि आप ने ३०० वर्ष तक वेद का अध्ययन किया है तथापि आपको सम्पूर्ण ज्ञान का अन्त प्राप्त नहीं हुआ । ३०० वर्ष में इस अनन्त ज्ञान-राशि से तुमने तीन मुट्ठी ज्ञान प्राप्त किया है।

ब्राह्मणकार की दृष्टि में वेदों का क्या महत्त्व है यह इस आख्यायिका से स्पष्ट है।

महर्षि वाल्मीकि ने ब्राह्मणों के मुख से वेद का गौरव इस प्रकार व्यक्त कराया है-

या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी त्वत्कृते सा कृता वत्स वनवासानुसारिणी हृदयेष्वेव तिष्ठन्ति वेदा ये नः परं धनम् वत्स्यन्त्यपि गृहेष्वेव दाराश्चारित्ररक्षिताः ।। (वा० रा० अयो० ५४।२४,२५ )

             👉 जब श्रीराम वन को प्रस्थान कर रहे थे उस समय अनेक ब्राह्मणों ने भी उनके साथ जाने का निश्चय कर श्रीराम से कहा था- हे वत्स ! हमारा मन जो अव तक केवल वेद के स्वाध्याय की ही लगा रहता था, अब उस ओर न लग आपको वन यात्रा की ओर लगा हुआ है। हमारा परम घन जो वेद है वह तो हमारे हृदय में है और हमारी स्त्रियां अपने अपने पतिव्रत्य से अपनी रक्षा करती हुई घरों में रहेंगी।

             रामायण के पश्चात् अब महाभारत में वेद के गौरव विषयक विचारों का अवलोकन कीजिए वेद की गौरव गरिमा का गान करते हुए महर्षि  व्यास लिखते हैं-

अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा

 आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृतयः ॥’ ( महा० शान्ति० २३२।२४)

            👉 सृष्टि के आरम्भ में स्वयम्भू परमेश्वर ने वेदरूप नित्य दिव्यवाणी का प्रकाश किया जिससे मनुष्यों की सारी प्रवृत्तियां होती हैं।

अर्थसहित वेदाध्ययन के महत्त्व पर बल देते. – हुए महर्षि व्यास लिखते हैं।

यो हि वेदे शास्त्रे ग्रन्थधारणतत्परः ग्रन्थार्थत्तत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा भारं वहते तस्य ग्रन्थस्यार्थं वेत्ति यः
यस्तु
ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञो नास्य ग्रन्थागमो वृथा ॥ ( महा० शान्ति० ३०५।१३,१४)


             👉 जो वेद और शास्त्रों को कण्ठस्थ करने में तत्पर है परन्तु उनके अर्थ से अनभिज्ञ है उसका कंठ करना व्यर्थ ही है। जो ग्रन्थ के तात्पर्य को नहीं समझता, वह ग्रन्थ को रटकर मानो उसका बोझ ही ढोता है परन्तु जो अर्थ ज्ञानपूर्वक पढ़ता है उस का पढ़ना ही सार्थक है।
            प्रिय पाठकों! इसका यह अर्थ न निकालें कि हम अर्थ नहीं समझते और इसलिए हमें पढ़ने से छूट मिल गई है। ‘वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना प्रत्येक आर्य का परम धर्म है।’ प्रतिदिन वेद पाठ कीजिये । न पढ़ने से पढ़ना उत्तम है। लीजिये इस विषय में महर्षि दयानन्द के विचार पढ़िये –

               “अर्थज्ञान सहित पढ़ने से ही परमोत्तम फल की प्राप्ति होती है। परन्तु न पढ़ने वाले से तो पाठ-मात्रकर्ता भी उत्तम होता है। जो शब्दार्थ के विज्ञान सहित अध्ययन करता है वह उत्तमतर है। जो वेदों का अध्ययन कर उनके अर्थों को जानकर शुभ गुणों को ग्रहण और उत्तम कर्मों का आचरण करते हुए सर्वोपकारी होता है वह उत्तमोतम है।” (ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका पठन पाठनविषयः)

प्रिय पाठक पहले ही *मनुस्मृति* और दूसरी *स्मृतियों*, साथ ही *ब्राह्मण* ग्रंथों और ऐतिहासिक वृत्तांतों में वेदों की महिमा के बारे में विचार जान चुके हैं। अब हम *पुराणों* से कुछ अंश प्रस्तुत करना चाहते हैं।

 पुराण भी वेद की महिमा से भरे हुए हैं।

          # श्रीमद्भागवत् का कथन है-

वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः वेदो नारायणः साक्षात्स्वयंभूरिति शुश्रुम ॥ (भा० पु० ६।१।४०)

            👉 जो वेद में कहा है वही धर्म है और जो वेद के विरुद्ध है वही अधर्म है। वेद साक्षात् नारायण स्वरूप हैं क्योंकि वे आप ही (भगवान् के श्वास मात्र) से प्रकट हुए हैं।

          # अब कूर्म पुराण का एक वचन देखिये –

एकस्तु पुराणानि सेतिहासानि कृत्स्नशः एकत्र परमं वेदमेतदेवातिरिच्यते ॥ ( कूर्म० उ० ४६ १२६)

             👉 एक ओर इतिहास सहित सम्पूर्ण पुराण और एक ओर परम वेद-इन में वेद ही परम हैं, महान् हैं, श्रेष्ठ हैं।

          # देवी भागवत पुराण में वेद का महत्त्व इन शब्दों में प्रकट किया गया है-

सर्वथा वेद एवासौ धर्ममार्गप्रमाणकः
तेनाविरुद्धं
यत्किञ्चित्तत्प्रमाणं चान्यथा ।। यो वेदधर्ममुज्झित्य वर्ततेऽन्यप्रमाणतः
कुण्डानि
तस्य शिक्षार्थ यमलोके वसन्ति हि ॥ (देवी० भाग० ११।१।२६, २७)

             👉 घर्म के विषय में वेद ही प्रमाण है। जो कुछ वेद श्रविरुद्ध एवं वेदानुकूल है वही प्रामाणिक है, ग्रन्य नहीं। जो वेद को छोड़ कर दूसरे ग्रन्थों को प्रामाणिक मानता है उसके लिये यम लोक में कुण्ड तैयार हैं अर्थात् वह यमलोक में जलकुण्डों में गिरता है।

वेद की महिमा महान् है। मानव बुद्धि और उसका सीमित ज्ञान वेद की महिमा का बखान करने में असमर्थ हैं,

          # अतः अन्त में गरुड़ पुराण की सम्मति देकर हम इस प्रसङ्ग को समाप्त करना चाहते हैं।

सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति देवः केशवात् परः ॥ (गरुड़० प्र० का० १०२ ५५ )

           👉 मैं दुहाई देकर और भुजा उठाकर सत्य सत्य कहता है कि वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है और केशव परमात्मा से बढ़ कर कोई देव नहीं है।

विदेशी विद्वानों के विचार

              वेद संस्कृत साहित्य के अनमोल रत्न और वैदिक संस्कृति व परंपराओं का मूल आधार हैं; दरअसल, वैदिक विचारकों, *स्मृति* लेखकों और *पौराणिक* इतिहासकारों, सभी ने वेदों की महिमा का गुणगान किया है। सिर्फ़ भारतीय विद्वान ही वेदों के मूल स्वभाव और पूरी तरह से उनके बारे में जानकर मोहित और रोमांचित नहीं हैं; पश्चिमी दुनिया भी उतनी ही मोहित है। उन सभी ने वेदों में निहित अलौकिक ज्ञान की प्रशंसा की है। इनमें से कुछ विचार यहाँ प्रस्तुत हैं—

प्रो० हीरेन (Prof. Heeren) महोदय लिखते हैं-

The Vedas stand alone in their solitary splendour serving as beacon of Divine Light for the onword n.arch of humanity.    (Historical Researches Vol. II P. 127)

            👉 जिस प्रकार वेद देदीप्यमान हैं इस प्रकार अन्य कोई ग्रन्थ नहीं चमकता। वे मनुष्यमात्र कीउन्नति और प्रगति के लिये दिव्य प्रकाशस्तम्भका काम देते हैं।

लार्ड मोर्ले ने घोषणा की-

What is found in the Vedas exists now-where else.   (The Nineteenth Century and after)

          👉 जो कुछ वेदों में मिलता है वह अन्यत्र कहीं  नहीं है।

          १४ जुलाई १८८४ को पेरिस में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य संघ (International Literary Association) के समक्ष  निबन्ध पढ़ते हुए फ्रांस देशीय विद्वान् (Mons. Leen Delbos) – लेश्रो देल्बो ने कहा था- The Rigveda is the most sublime conception of the great highways of humanity.   (हरबिलास शारदा लिखित Hindu Superiority  page no. 179 में उद्धृत)

            👉 ऋग्वेद मनुष्य मात्र की उच्चतम प्रगति और आदर्श की उच्चत्तम कल्पना है।

 उबिनगन विश्वविद्यालय के प्रो. पाल थीमा ने २६वीं अन्तर्राष्ट्रीय प्राच्य सभा (26th Internation Cogress of Orientalists) में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था

The Vedas are noble documents-do-cuments not only of value and pride to – India but to the entire humanity because in them we see man attempting to lift himself above the earthly existence.   (Hindustan Times 6 January 1964)

           👉 वेद वे पविन्न ग्रन्थ हैं जो न केवल भारतवर्ष के लिये अपितु समस्त संसार के लिये मूल्यवान् हैं
क्योंकि हम उनमें मनुष्य को सांसारिकता से ऊपर उठने (मोक्ष प्राप्त करने) का यत्न करते हुए पाते हैं।

प्रसिद्ध आइरिश कवि और दार्शनिक डा० जेम्स क्यूजन अपनी पुस्तक Patli to Peace (शान्ति का मार्ग) में लिखते हैं-

On that (Vedic) ideal alone, with its inclusiveness which absorbs and annihilates the causes of antogonisms, its sympathy which wins hatred away from itself, it it possible to rear a new earth in the image and likeness of the eternal heavens.    (Path to Prace by Dr. James Cousins P.60)

             👉 उस वैदिक आदर्श का अनुकरण करते हुए ही जो सार्वभौम होने के कारण विरोध के कारणों को नष्ट करता है, जो सहानुभूति से घृणा को जीत लेता है, यह सम्भव है कि पृथिवी को पुनः स्वर्गधाम बनाया जा सके ।

थ्योरो नामक अमेरिकन विद्वान् के मुख से वेद की महिमा इन शब्दों में निस्सरित हुई थी-

What extracts from the Vedas I have read fall on me like the light of a higher and purer luminary which describes a loftier course through a purer stratum-free from particulars, simple universal, the Vedas contain a sensible account of God.  (स्वामी श्रोंकार लिखित Mother America पृष्ठ में उद्धृत)

           👉 मैंने वेदों के जो उद्धरण पढ़े हैं वे मुझ पर एक उच्च पवित्र प्रकाश पुञ्ज की भांति पड़े हैं। वेद एक उत्कृष्ट मार्ग का वर्णन करते हैं। वेदों के उपदेश, सरल सार्वभौम है, और जाति तथा देश के इतिहास से रहित हैं। उन में ईश्वर विष-यक युक्तियुक्त विचार हैं।

श्री डबल्यू० डी० ब्राऊन (W. D. Brown) महोदय ने वैदिक धर्म के विषय में निम्न उद्‌गार व्यक्त किये हैं-

It (Vedic Religion) recognises but one God. It is a thoroughly scientific religion where reigion and science meet hand in hand. Here theology is based upon science and philosophy.   (The Superiority of the Vedic Religion)

             👉 वैदिक धर्म केवल एक ईश्वर का प्रतिपादन करता है। यह एक पूर्णतया वैज्ञानिक धर्म है जहां धर्म और विज्ञान साथ साथ चलते हैं। वेदों में धार्मिक सिद्धान्त विज्ञान और दर्शन पर आधा-रित हैं।

वेदों में वैज्ञानिक आविष्कारों की सत्ता को स्वीकार करते हुए अमरीकी महिला ह्वीलर विलोक्स ने लिखा-

We have all heard and read about the ancient religion of India. It is the land of the great Vedas-the most remarkable works containing not only religious ideas for a perfect life, but also facts which all =the science has since proved true. Electricity Radium, Electrons, Airships all seem to be known to the seers who found the Vedas.   (Sublimity of the Vedas P. 83)

            👉 हमने प्राचीन भारत के धर्म के विषय में पढ़ा और सुना है। यह उन महान् वेदों की भूमि है – जो अत्यद्भुत ग्रन्थ हैं। इन में न केवल जीवनोपयोगी धार्मिक तत्त्वों का ही वर्णन है अपितु उन तथ्यों का भी प्रतिपादन है जिन्हें विज्ञान ने सत्य सिद्ध किया है। विद्युत्, रेडियम, एलेक्ट्रोन्स – तथा विमान आदि सभी वस्तुएं वेदों के द्रष्टा ऋषियों को ज्ञात प्रतीत होती हैं।
 अपने “त्रयी-चतुष्टय” में प्रसिद्ध भारतीय विद्वान् पं० सत्यव्रत सामश्रमी ने भी लिखा है-“वेदों में सारे विज्ञान, सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं।’

बड़ौदा में “यन्त्रसर्वस्व” नामक एक हस्त-लिखित ग्रन्थ मिला है जिसके लेखक महर्षि भरद्वाज हैं। इस ग्रन्थ के “वैमानिक प्रकरण” में लिखा है कि “वेदों के आधार पर ही इस ग्रन्थ को बनाया गया है।”

प्रसिद्ध पारसी विद्वान् फर्दून दादा चान जी वेदों की महिमा का वर्णन करते हुए लिखते हैं-

The Veda is a book of knowledge and wisdom comprising the Book of Nature, the Book of Religion, the Book of Prayers the Book of Morals and so on. The word ‘Veda’ means wit, wisdom, knowledge and truly the Veda is condensed wit, wisdom and knowledge.
(Philosophy of Zoroastrianism P. 100)

            👉 वेद ज्ञान की पुस्तक है। इस में प्रकृति, धर्म, प्रार्थना, सदाचार आदि विषर्या की पुस्तकें सम्मि-लित हैं। वेद का अर्थ है ज्ञान और वस्तुतः वेद ज्ञान विज्ञान से ओत-प्रोत हैं।

फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान् बाल्टेयर का मत है-“केवल इसी देन (ऋग्वेद) के लिये पश्चिम पूर्व का ऋणी रहेगा।”

फ्रांस देश के अन्य विद्वान् जैकोलियट ने अपने ग्रन्थ The Bible in India में लिखा-

Astonishing fact! The Hindu Reve-lation (Veda) is of all revelations the only one whose ideas are in perfect har-mony with Modern Science as it proclaims the slow and gradual formation of the world.  (The Bible in Iudia Vol. II Chapter 1)

             👉 कितनी आश्चर्यजनक सचाई है । सम्पूर्ण ईश्वरीय ज्ञानों में हिन्दुओं का ईश्वरीय ज्ञान वेद ही ऐसा है जिसके विचार वर्तमान विज्ञान से पूर्ण रूपेण मिलते हैं, क्योंकि वेद भी विज्ञानानुसार जगत् की मन्द और क्रमिक रचना का प्रतिपादन करते हैं।

ईसाई पादरी मौरिस फिलिप (Rcv. Moris Philip) ने भी वेद को ईश्वरीय ज्ञान स्वीकार किया है। वे लिखते हैं

The conclusion therefore, is inevitable viz that the development of religious thought in India has been uniformly down-ward, and not upward, deterioration and not evolution. We are justified, therefore, in concluding that the higherer and purer conceptions of the Vedic Aryans were the results of a primitive Divine Revelation.           (The Teachings of the Vedas P. 231)

            👉 अतः हमारे लिये इस परिणाम पर पहुँचना अनिवार्य है कि भारत में धार्मिक विचारों का विकास नहीं हुआ अपितु ह्रास हो हुआ है, उत्थान नहीं अपितु पतन ही हुम्रा। इसलिये हम यह परिणाम निकालने में न्यायशील हैं कि वैदिक आर्यों के उच्चतर और पवित्रतर विचार एक प्रारम्भिक ईश्वरीय ज्ञान का परिणाम थे ।

अन्त में जे० मास्करो J. Mascaro M. A. की सम्मति उद्धत कर हम आगे बढ़ेगे। वेद की तुलना आत्मा के हिमालय से करते हुए वे लिखते हैं

If a Bible of India were compiled….. the Vedas the Upanishads and the Bhagvad Gita would rise above the rest like Hima-layas of the spirit of man.     (The Himalayas of the Soul P. 151)

            👉 यदि भारत की कोई बाइबिल संकलित की जाये तो उस में वेद, उपनिषदें और भगवद्गीता मानवीय आत्मा के हिमालय के समान सब से ऊपर उठे हुए ग्रन्थ होंगे ।

             ये तो हुए कुछ निष्पक्ष विचारकों के निष्पक्ष विचार । परन्तु अनेक पाश्चात्य लेखकों ने अपना जीवन और जवानी वेदों के सम्बन्ध में खोज करने में लगा दी वेदों में निहित अलौकिक ज्ञान ने भारतीय विद्वानों के साथ-साथ पश्चिमी जगत को भी मोहित और प्रभावित किया है।

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।

 सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”

             👉 सब लोग सुखी हों, सब लोग निरोग हों, सबको शुभ दिखाई दे और कोई भी दुःख का भागी न बने।

यह वैदिक प्रार्थना पूरी मानवता के कल्याण की कामना करती है — इसमें न जाति, न देश, न धर्म का भेद है; केवल सार्वभौमिक प्रेम और शांति का संदेश है।

वेदों में जगत की आत्मा और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग निहित है।”

🌼  शान्तिः शान्तिः शान्तिः 🌼

आभार/स़्त्रोत:- प्रस्तुत लेख में ब्र. जगदीष वि़द्यार्थी की पुस्तक ‘‘वेद प्रकाष’’ सितम्बर 1965 के पृ. 25 से 33 तक का कुछ अंष समीक्षा हेतु साभार लिए गए है।